8TH SEMESTER ! भाग- 122( Bloody End of 3rd Semester- 2)
"इधर देख बे... रंडी की औलाद...पहले जाकर अपनी माँ से पुछ्ना कि कितनो का लेकर तुझे पैदा किया है, फिर मुझसे बात करना"
मै गौतम कि तरफ बढ़ा और गौतम मेरी तरफ... इतने मे एक लड़के ने मुझे आवाज़ देकर लोहे का रॉड मेरी तरफ फेका जिसे दौड़ते हुए कूदकर मैने पकड़ा और मज़बूती से ग्रिप बनाते हुए बिना कुछ सोचे-समझे अपनी पूरी ताक़त से वो रॉड सामने से आ रहे गौतम के सर मे दे मारा....
"साला, हरामी... मेरे सामने गुंडई करता है... पेलो रे इन सब माँ दे लाड़लो को... एक -एक के खून से हॉस्टल को सींच दो... "
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गौतम के सर पर लोहे का रोड मैने इतनी तेज़ी से मारा था कि वो उसी वक़्त अपने होश खो बैठा ,उसके सिर से उसी वक़्त खून की धारा बहने लगी...मेरा प्रहार इतना तेज था कि गौतम के चेहरे का कोई भी अंग इस वक़्त नही दिख रहा था...दिख रहा था तो सिर्फ़ खून...सिर्फ़ और सिर्फ़ खून... तब तक हॉस्टल के सभी लड़के वहा पहुंच गये थे और एक -एक करके गौतम के चमचो को पकड़ कर पीटने लगे... उनकी संख्या, हॉस्टलर्स के सामने बिल्कुल उट के मुँह मे जीरे के समान थी... मतलब कोई मुकाबला ही नहीं था... इतनी तादाद मे थे हम लोग. गौतम फर्श पर बेहोश पड़ा हुआ था,जिसे मैने रॉड ठेलकर सीधा किया और अपनी पूरी क्षमता से एक रॉड उसके पेट मे मारा... अबकी बार खून सीधे उसके मुँह से निकल कर मेरे उपर पड़ा, जिसे हाथो से साफ करते हुए मैने एक और रॉड गौतन के पेट मे मारा...
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उस दिन हॉस्टल मे बहुत बड़ा लफडा हुआ था... हम हॉस्टल वालो ने गौतम और उसके सभी दोस्तो को बहुत मारा...उस समय गुस्से मे शायद मैं ये भूल चुका था कि लोहे की रॉड से जिसका मैं सर फोड़ रहा हूँ,वो कोई आम लड़का नही है.... गौतम के पेट मे रोड मारकर उसके मुँह से खून निकालते वक़्त मैं ये भूल चुका था कि गौतम का बाप एक बहुत बड़ा गुंडा है और वो इसका बदला मुझसे ज़रूर लेगा.... बहुत बुरी तरह लेगा
मैने अब तक के अपने ज़िंदगी के 19 साल मे आज सबसे बड़ी ग़लती कर दी है ,इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ , जब गौतम को बेहोशी की हालत मे एम्बुलेंस के ज़रिए हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था... मैं उसी वक़्त समझ गया था कि इस एक्शन का रिएक्शन तो होगा और वो भी बहुत बहुत बुरा...मेरा गुस्सा जब से शांत हुआ था तभी से मेरे अंदर एक डर घर कर चुका था और वो डर ये था कि गौतम का बाप अब मेरा क्या हाल करेगा...?? यदि ये कॉलेज की छोटी-मोटी लड़ाई होती तो शायद उसका बाप इसे इग्नोर भी कर देता लेकिन यहाँ उसके एकलौते बेटे का मैने सर फोड़ डाला था...मैं ख़ौफ खा रहा था उस पल के लिए, जब गौतम का बाप अपने बेटे का खून से सना शरीर देखेगा... इस समय मेरे दिमाग़ ने भी अपना साइड एफेक्ट दिखाना शुरू कर दिया... इस समय जब मुझे मेरे दिमाग़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तो वो मुझे धोका देकर आने वाले समय मे मेरा हाल क्या होने वाला है ,ये दिखा रहा था... मैने देखा कि गौतम के बाप ने मेरे सर पर ठीक उसी तरह से रॉड मारा है, जैसे कि मैने गौतम के सर पर मारा था...
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"अरमान..."किसी ने मुझे पुकारा
"अरमान..."
"अबे अरमाननननननन "कोई मेरे कान के पास ज़ोर से चिल्लाया...
"क्या है बे..साले "हॉस्टल मे रहने वाले उस स्टूडेंट को देख कर मैने पुछा
"सिदार सर,तुझे अमर सर के रूम मे बुला रहे है...चल जल्दी.."
"सिदार भाई,इतनी जल्दी हॉस्टल कैसे पहुचे...उन्हे तो मैने कॉल तक नही किया था..."
"तू खिड़की के पास ही खड़ा है तो क्या तूने सूरज को ढलते हुए नही देखा...??? बेटा बाहर नज़र मार ,रात हो चुकी है...अब चल जल्दी से,वॉर्डन भी वहाँ अमर सर के रूम मे मौज़ूद है..."
उसके कहने पर मैने बाहर देखा और इस वक़्त सच मे रात थी... मैने बौखलाते हुए अपनी घड़ी मे टाइम भी देखा तो रात के 7 बज रहे थे. यानी कि मैं घंटो से यही खिड़की के पास खड़ा बाहर देख रहा हूँ, लेकिन मुझे ये नही मालूम चला कि रात कब हो गयी....??
"चल..चलते है.."उस लड़के के साथ रूम से बाहर निकलते हुए मैने कहा...
रूम से बाहर आते वक़्त मेरी नज़र अपने आप ही वहाँ पड़ गयी,जहाँ कुछ घंटे पहले गौतम खून मे सना हुआ लेटा था... वहाँ खून के निशान अब भी थे और मेरे दिमाग़ ने आने वाले पल की भविष्यवाणी करते हुए मुझे वो सीन दिखाया जिसे देख कर मेरी रूह कांप गयी. मैने देखा की मैं खून से लथपथ कहीं पड़ा हुआ हूँ और जानवर मेरे शरीर को नोच-नोच कर खा रहे है....
"अरमान..क्या हुआ,.."मुझे होश मे लाते हुए उस लड़के ने हैरानी से मेरी तरफ देखा....
"कुछ नही...चल..बस गौतम मरने ना पाए..."
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अमर सर के रूम के अंदर इस वक़्त लगभग सभी सोर्स वाले हॉस्टलर्स बैठे हुए थे...कुछ फोन पर किसी से बात कर रहे थे तो कुछ आपस मे आज हॉस्टल मे हुए मार-पीट के बारे मे डिस्कशन कर रहे थे... हमारा हॉस्टल वॉर्डन सब लड़को के सामने एक चेयर पर अपना सर पकड़ कर बैठा हुआ था. इन सबकी वजह सिर्फ एक शख्स था और वो एक शख्स मै था.
मेरे अंदर आते ही सब एकदम से शांत हो गये, जो कुछ देर पहले किसी को कॉल पे कॉल किए जा रहे थे उन्होने मोबाइल नीचे कर लिया... जो लोग घंटो पहले हुई इस मार-पीट के बारे मे डिस्कशन कर रहे थे वो मुझे देख कर चुप हो गये और हॉस्टल वॉर्डन ने बिना समय गवाए एक तमाचा मेरे गाल पर जड़ दिया...
"बहुत बड़ा गुंडा है तू...अब पता चलेगा तुझे की असलियत मे गुंडागिरी क्या होती है...तेरी वजह से मेरी नौकरी तो जाएगी ही,साथ मे तेरी जान भी जाएगी..."बोलकर वॉर्डन ने अपनी कुर्सी पकड़ ली और बैठ कर फिर से अपना सर पकड़ लिया....साला फट्टू
वैसे तो मैं वहाँ मौज़ूद सभी सीनियर्स,क्लासमेट और जूनियर्स को जानता था पर इस वक़्त मेरी आँखे सिर्फ़ और सिर्फ़ सिदार पर टिकी हुई थी... बाकियो को मै जैसे भूल चुका था उस वक़्त...
"ये लोग जो कह रहे है क्या वो सच है...क्या तूने ही गौतम को मारा है..."सिदार ने पुछा
"हां..."
"तो अब क्या सोचा है...कैसे बचेगा इन सब से और मेरे ख़याल से तूने प्लान तो बनाया ही होगा कि गौतम को मारने के बाद तू उसके बाप से कैसे बचेगा..."
"मैं गौतम को नही मारना चाहता था, मेरा प्लान उसे हॉस्टल से बाहर सही सलामत बाहर भेजनें का था... वो तो अचानक गुस्से मे सब कुछ हो गया... MTL भाई "
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उस दिन शायद वो पहला मौका था जब मैं कुछ सोच नही पा रहा था, मैं जब भी इन सबसे बचने के लिए कुछ सोच-विचार करता तो मेरा दिमाग़ अलग ही डायरेक्शन मे मुझे ले जाता था.. जहाँ मैं जाना नही चाहता था...उस दिन हमारी मीटिंग घंटो तक चली और उस मीटिंग से हमारे सामने दो प्राब्लम आए और उस प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए हॉस्टल के हर एक लड़के ने सुझाव दिया ,सिर्फ़ मुझे छोड़ कर ,कि अब आगे क्या करना चाहिए. वॉर्डन हमारे साथ था और वॉर्डन ने कॉलेज के प्रिन्सिपल को भी रात मे पट्टी पढ़ा दी थी कि लड़ाई हॉस्टल मे हुई और बाहरी लड़के हॉस्टल मे घुसे थे और हॉस्टल मे घुसते ही वो एक -एक करके सभी स्टूडेंट्स को मारने लगे... जिसके बाद पुरे हॉस्टलर्स एक हुए और उन सबको मारा....
वैसे वार्डन ने सही गेम खेला था... क्यूंकि हम तो कही गये नहीं लड़ने और ना ही हम 20-30 लड़को को पकड़ कर हॉस्टल ला सकते है... वो खुद होनी मर्जी से यहाँ आए थे... ये हमारे लिए बहुत बड़ा प्लस पॉइंट था और केस अब सेल्फ डिफेन्स का था.. कुछ लड़को ने आपस मे खुद को हॉकी स्टिक से भी मारा था.. ताकि जांच मे साबित हो जाए की... जो कुछ भी हुआ वो सेल्फ डिफेन्स मे हुआ. अब हमें उम्मीद थी कि प्रिन्सिपल पुलिस के सामने हमारा साथ देगा.... ये कहानी ही ऐसी थी. फिर भी मेरे सामने इस वक़्त दो प्रॉब्लम्स थी और वो दोनो ही प्रॉब्लम्स कल सुबह की पहली किरण के साथ मेरी ज़िंदगी मे दस्तक देने वाली थी....पहली प्राब्लम ये थी कि मुझपर और मेरे दोस्तो पर गौतन का बाप हाफ-मर्डर ओर अटेंप्ट टू मर्डर का केस बनवाएगा ...दूसरा ये कि यदि मै कानून के चंगुल से बच भी गया तो गौतम का बाप हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ने वाला था , जिसके बाद मेरा बचना नामुमकिन ही था..
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पुलिस केस को सुलझाने मे हमे ज़्यादा दिक्कतो का सामना नही करना पड़ा क्यूंकी गौतम और उसके दोस्त हॉस्टल के अंदर घुसे थे मतलब लड़ाई करने के इरादे से वो वहाँ आए थे और इसी मार पीट मे किसी ने गौतम के सर पर मार दिया ...हम मे से किसी भी एक लड़के का नाम सामने नहीं आया कि पुलिस उसे रिमांड पर ले सके क्यूंकि 600 हॉस्टलर्स मे से किसे वो रिमांड पर ले, किसे ना ले ये उनके लिए मुश्किल था ... हालाँकि कॉलेज मे सिटी वालों से पूछ -ताछ मे पुलिस वालों को मालूम चला की गौतम हॉस्टल मे अरुण को मारने घुसा था... लेकिन अरुण तो हॉस्टल मे था ही नहीं उस वक़्त... ये गौतम के उन साथियो ने भी स्वीकारा... जो गौतम के साथ अरुण को मारने हॉस्टल मे घुसे थे और जो बयां देने के काबिल बचे थे... इसलिए अरुण का नाम आने के बावजूद... अरुण एकदम साफ बच गया. हमने उस थ्री स्टार की वर्दी पहने हुए पुलिस वाले के सामने ये प्रूव कर दिया कि गौतम हमे मारने आया था और जिन चुनिंदा लड़को का का नाम सिटी वालों ने बिना किसी प्रूफ के f.i.r. मे लिखवा दिया है, जैसे की मैं.... हम सब तो कल रिसेस के बाद वॉर्डन से दो दिन की छुट्टी माँग कर घर के लिए निकल गये थे और आज सुबह सुबह लौटे है... इसकीन ना हो तो रजिस्टर देख लो... दो दिन कि छुट्टी लेने वालों को वापस इसलिए बुला लिया गया ताकि पुलिस को ये ना लगे कि कॉलेज किसी को बचाने की कोशिश कर रहा है...
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हमने इन सबसे बचने के लिए तिकड़म तो अच्छा खेला, सबने खेला... लेकिन बात यहाँ शहर के एक जाने -माने आदमी के बेटे की थी, जिसे हमने अधमरा कर दिया था और जो शायद कुछ दिन के बाद मरने भी वाला था... इसलिए सभी तरफ से खुद को मजबूत करने के बावजूद मुझे ,हॉस्टल मे रहने वाले कुछ लड़को के साथ पुलिस स्टेशन ले जाया गया...जहाँ मुझे शुरू मे धमकाया गया और फिर कहा गया कि "यदि मैं उन्हे सब सच बता देता हूँ तो वो मुझे कुछ नही होने देंगे..."
वो मुझसे वो सब पुछ रहे थे जिसे ना बताने की प्रैक्टिस इस सिचुएशन को सोचकर मैने उस दिन से की थी, जिस दिन से गौतम खून मे लथपथ हॉस्टल से गया था.. क्यूंकि मुझे इस सिचुएशन का अंदाजा हो चला था. मैने कई रात पुलिस ईंटोरेंगेशन के बारे मे पढ़ा, समझा और उसी हिसाब से खुद के जवाब तैयार किये. .पुलिस वालो ने दो दिन पहले की घटना के बारे मे मुझसे जितनी बार भी पुछा...जिस भी तरीके से पुछा, जो भी पूछा... मैने हर बार अपना सर ना मे हिलाया और ज़ुबान ना मे चलाई...कि मै तो उस वक़्त वहा था नहीं.. यकीन नहीं तो हॉस्टल का रजिस्टर देख लो, हॉस्टल वार्डन से पुछ लो, हॉस्टल के लड़के से पुछ लो.
"हां सर,हम उसे ला रहे है..."उस थ्री स्टार की वर्दी पहने हुए पुलिस वाले ने फोन पर किसी से कहा और मेरी तरफ देख कर बोला"चल ...तेरे प्रिन्सिपल का फोन आया है,.."
"मैने तो पहले ही कहा था कि मुझे कुछ नही मालूम...जो लड़के मेरा नाम बता रहे है वो मुझसे खुन्नस खाए हुए है...इसीलिए उन्होने मेरा नाम बताया..."
"मैने तुझसे पहले भी कहा है और अब भी कह रहा हूँ कि मेरे कंधे पर ये तीन स्टार ऐसे ही नही लगे है...चूतिया किसी और को बनाना...अब चल, तेरा प्रिंसिपल फ़ोन पे फ़ोन किये जा रहा है... उसका क्लासमेट कलेक्टर है, वरना उसकी बात मै धुए कि तरह उड़ा देता .."